जीजाजी कों भी मना लो , नहीं तो फूफा बन जायेंगे!
सरकारी खजाना जनता का है किसी की निजी सम्पति नहीं है.
- उमाकांत शर्मा बैतूल: देवी के दर्शन तभी पूरे माने जाते हैं, जब दर्शनार्थी भैरव महाराज के भी दर्शन करे. सरकार ने देवी स्वरूप भानजियों और बहनों के लिए लाड़ली बहना योजना शुरू कर दी है. कांग्रेस भी सरकार में आने के लिए अभी से नारी सम्मान का वचन पत्र दे रही है. लेकिन जीजाओं पर दोनों ही दलों का ध्यान नहीं है. कहीं ऐसा ना हो कि बहनों को साधने के चक्कर में जीजा फूफा बन जाए. इसलिए अब जीजाओं के लिए भी कोई योजना शुरू करना चाहिए. दोनों ही दलों ने जीजाओं को उनके हाल पर छोड़ दिया है. अब जीजाओं को फूफा बनने से रोकना है, तो उनके लिए भी “लाड़ला भेरू” योजना जल्द शुरू करना होगी, नहीं तो चुनाव में जीजा भेरू बनकर फूं-फां करते रहेंगे. एक तरफ भेरूओं को सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल रहा है, दूसरी तरफ भेरूओं पर अत्याचार अलग से हो रहा है. कभी बिजली बिल के नाम पर कुर्की, रोजगार का अभाव, फसलों का मुआवजा ना मिलना. जैसे-तैसे भेरू अहाते में बैठकर अपना गम भुला लेते थे, तो वो अहाते भी बंद करवा दिये गए हैं.यानि भेरूओं की स्थिति बद से बद्तर है,
क्योंकि योजनाओं का लाभ देवियों को मिल रहा है और बिना योजनाओं के भेरू
बौरा रहे हैं. देवियों को बैंक ले जाना, ईकेवायसी करवाना, फॉर्म भरवाना, जमा करवाना, इत्यादि इत्यादि अतः भेरूओं ने भी संघर्ष किया है . घर- घर में विराजे भेरू अब अपनी-अपनी देवियों के खाते को आसभरी नजरों से देख रहे हैं कि इनके खाते में आई लक्ष्मी से कब उनका उद्धार होगा. भेरूओं को किसी योजना का लाभ नहीं मिल रहा यही कारण हैं कि कई जगह भेरू देवीय आराधना करने में लगे हैं,क्योंकि देवियों के खाते में लक्ष्मी प्रकट होने लगी है और इसी लक्ष्मी से भेरूओं कों राहत राशि दी जावेगी. पिछले दिनों कुछ भेरू विमल गुटखा और पूना की हरिभाई देसाई बीड़ी का एक झोला लटकाये , उसमें फॉर्म, आधार कार्ड, पेन कार्ड, समग्र आईडी, दो फोटो देवी की और उनका मोबाईल लेकर घूम रहे थे . अब इसी सेवा का हवाला देकर वो देवियों से 1 हजार में से अपना कुछ हिस्सा मांगने का हक रखते हैं. पूरा तंत्र देवी आराधना में लगा है. लेकिन भेरू की तरफ किसी का ध्यान नहीं है. कहीं ऐसा ना हो कि देवी आराधना के चक्कर में भेरू रूठ जाएं. क्योंकि भेरू भी अच्छी खासी तादात में हैं.
जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है. वैसे-वैसे राजनीति के विक्रमों ने अपने-अपने बेताल और तोतो को पास बैठाना शुरू कर दिया है यहां तक कि राजनीतिक भेरूओं के भी दिन पलट गए हैं. उनकी भी पूछपरख करने लगे हैं दावेदार. जो राजनीतिक भेरू बीते चार साल से पांव पांव थे, वे भी अब नेता की गाड़ी की पिछली सीट में स्थापित हो गए हैं. कई भेरू तो राजनीति में ऐसे हैं, जिनके चबूतरे उखड़ गए हैं, लेकिन अब उन्हें नए आसन बनाने का आश्वासन दिया जा रहा है. चुनाव तक ही सही भेरूओं की पूछपरख तो बढ़ी.
चुनाव में अभी कुछ महीने का समय
है. ऐसे में टिकट के दावेदार क्षेत्र में गोदभराई कार्यक्रम हो या सूरज पूजा हो या किसी का जन्मदिन हो, शादी हो, उठावना हो या फिर पगड़ी हो,या कोई सा भी अवसर,दावेदार नहीं छोड़ रहे हैं. हर दावेदार बस खबर लगी कि क्षेत्र के शुभ-अशुभ हर कार्यक्रम में अपनी झलक दिखा देते है . भोजन, भंडारे की राजनीति चरम पर है. कलफदार कुर्ता, आंखों पर चश्मा और गाड़ी की पिछली सीट पर अपने दो तोतों के साथ हर कार्यक्रम में इनकी झलक देखी जा सकती है. तोतों का काम यह है कि दावेदार गाड़ी से उतरे और उनके फोटो सोशल मीडिया पर डाले.
इस बार राजनीति का सूचकांक उछाल पर रहेगा, क्योंकि इस साल चुनाव जो हैं और लूटने वाले ही बांटेंगे.