विभिन्न मांगो कों लेकर हड़ताल पर गये सहकारी समिति कर्मचारी

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भारतीय अर्थव्यवस्था का का मूल आधार कहें जाने वाले सहकार कों भीषण महंगाई की मार एवं बढ़ते काम के बोझ एंव अंधकारमय भविष्य की चिंता ने एक बार पुनः आंदोलन को मजबूर कर ही दिया. ऐसा नहीं है कि यह आंदोलन पहली बार किया जा रहा है बल्कि वर्षों से सहकारी समिति कर्मचारियों की यह मांग है कि उन्हें शासकीय कर्मचारियों की भांति सेवा नियम एवं उनके समतुल्य वेतन दिए जाएं कोरोना कॉल वैश्विक महामारी के समय भी पूरी कर्मठता से इस वर्ग ने अपने कर्तव्य का पालन व निर्वहन किया है. सदैव अनुशासनात्मक एवं शिष्टाचार में रहकर प्रत्येक सहकारी कर्मचारी ने शासन से निरंतर निवेदनात्मक अपनी मांगों को स्वीकार करने की विनती की है फिर भी गांधीवादी विचारधारा के लोगों की शासन और प्रशासन ने एक न सुनी जिससे हताश होकर वें एक बार पुनः स्वतंत्रता दिवस के अगले ही दिन यानी 16 अगस्त को हड़ताल पर बैठ गए बैतूल जिले की सभी सहकारी समिति एवं सभी शासकीय उचित मूल्य की दुकान इस हड़ताल में शामिल होकर बंद रही. संयुक्त सहकारी समिति महासंघ के तत्वाधान में बैतूल को ऑपरेटिव सोसाइटी कर्मचारी संघ द्वारा दिनांक 16.08.2023 आज दूसरे दिन भी जिले की 91 सहकारी समिति एवं 590 शासकीय उचित मूल्य की दुकाने बंद रही, जिसमें जिला मुख्यालय पर लगभग जिले के 589 कर्मचारी अपनी न्यायोचित मांगो को लेकर अनिश्चितकालीन कलम बंद हड़ताल पर है। संघ के प्रवक्ता धर्मराज उघड़े एवं योगेश गढ़ेकर द्वारा बताया गया कि हमारी शासन से प्रमुख मांगे है कि शासकीय कर्मचारियों की भांति सहकारी समिति कर्मचारियों का भी सेवा नियम एवं उनके समतुल्य वेतनमान निर्धारण किया जावें, साथ ही जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक में होने वाली 60 प्रतिशत पदोन्नति भर्ती में संस्था के कर्मचारियों में से ही की जावें, जिसके लिए निर्धारित भर्ती नियमों में शिथिलता प्रदान करते हुए भर्ती प्रक्रिया पूर्ण की जाये। वर्तमान में खरीफ फसल बीमा का कार्य किया जा रहा है। जिसका समितियों को वर्ष 2016 से बीमा प्रीमियम एकत्रीकरण का 4 प्रतिशत कमीशन देने का प्रावधान है, जिसे तत्काल दिया जावें। संघ के जिलाध्यक्ष अशोक देशमुख ने कहा कि उपरोक्त मांगे पूरे नहीं होती है तो आंदोलन निरंतर जारी रहेगा, साथ ही महासंघ के आव्हान पर 22.08.2023 को भोपाल में समूचे मध्यप्रदेश के कर्मचारी पहुंचेंगे, जहाँ एक विशाल आमसभा का आयोजन किया जावेगा। जानकारों का मानना है कि यह चुनावी वर्ष है और इस समय शासन ने कई विभागों के कर्मचारियों अधिकारियों की मांगे स्वीकार की है, जब सहकारी कर्मचारी वर्षों से अपनी मांगों को लेकर निवेदन करते आ रहे हैं तो उनकी मांगों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक होगा ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी कर्मचारी वर्गों का अच्छा खासा प्रभाव रहता है. इस हिसाब से भी सरकार को सहकारी कर्मचारियों को नाराज करना ठीक नहीं होगा. क्योंकि बिन सहकार नहीं उद्दार.


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